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CIDCO में बड़ा विवाद: 457 करोड़ की जगह 50 करोड़ में समझौता, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उठे गंभीर सवाल

CIDCO में बड़ा विवाद: 457 करोड़ की जगह 50 करोड़ में समझौता, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उठे गंभीर सवाल

नवी मुंबई: सिडको (CIDCO) द्वारा एक अहम भूखंड नियमितीकरण मामले में लिया गया निर्णय अब बड़े विवाद में घिरता जा रहा है। जहां एक ओर आर्थिक मूल्यांकन के आधार पर 457 करोड़ रुपये की वसूली का प्रस्ताव था, वहीं दूसरी ओर केवल 50 करोड़ रुपये में समझौता किए जाने से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में तीखी चर्चा शुरू हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन को लेकर भी गंभीर शंकाएं उत्पन्न कर दी हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी?

27 अक्टूबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि सिडको इस मामले में स्वतंत्र और मेरिट के आधार पर निर्णय ले और उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे।

लेकिन 4 फरवरी 2026 को सिडको ने जो फैसला लिया, उसमें राज्य सरकार के निर्देशों को प्राथमिकता देते हुए केवल 50 करोड़ रुपये (ब्याज सहित) लेकर भूखंड को नियमित करने का निर्णय लिया गया।

इस निर्णय के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या सिडको ने वास्तव में स्वतंत्र निर्णय लिया या फिर सरकारी दबाव में आकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी की गई?

457 करोड़ बनाम 50 करोड़: बड़ा अंतर

* सिडको के अर्थशास्त्र विभाग ने वर्ष 2014 के दर के अनुसार भूखंड की कीमत 457 करोड़ रुपये आंकी थी

* जीएसटी सहित यह रकम करीब 539 करोड़ रुपये तक पहुंचती थी

* इसके बावजूद अंतिम निर्णय में केवल 50 करोड़ रुपये की वसूली पर सहमति दी गई। यह भारी अंतर अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है और इसे संभावित आर्थिक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है।

पूरा मामला क्या है?

वर्ष 2003 में वाशी सेक्टर 30 में 30,651 वर्गमीटर भूखंड मे. के. रहेजा कॉर्प को दिया गया था

* उस समय दर था ₹10,250 प्रति वर्गमीटर, बाद में जांच में सिडको को लगभग 50 करोड़ रुपये के नुकसान की बात सामने आई

* 2005 में सरकार ने इस आवंटन को रद्द करने का निर्देश दिया

* 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आवंटन को अवैध और नियमविरुद्ध घोषित कर रद्द कर दिया।

हालांकि, अदालत ने कंपनी को सरकार के पास नियमितीकरण के लिए आवेदन करने की अनुमति दी थी।

समितियों की राय और सरकारी भूमिका

भाटिया समिति ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए गए भूखंड को नियमित करना संभव नहीं। हालांकि, यदि नियमितीकरण किया जाता है तो 2014 के बाजार दर पर किया जाए। इसके बाद सिडको के अर्थशास्त्र विभाग ने उच्च दर निर्धारित की। लेकिन राज्य के एडवोकेट जनरल की राय के बाद सरकार ने 2005 की नीति के आधार पर नियमितीकरण का रास्ता अपनाने के निर्देश दिए।

बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल

इस प्रस्ताव को सिडको के संचालक मंडल के सामने तीन बार रखा गया, लेकिन हर बार निर्णय टाल दिया गया।

आखिरकार फरवरी 2026 में अचानक 50 करोड़ रुपये में समझौता कर लिया गया, जिससे इस पूरे निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल

* जब 457 करोड़ रुपये वसूलने का विकल्प मौजूद था, तो केवल 50 करोड़ पर समझौता क्यों?

* क्या यह निर्णय सरकारी दबाव में लिया गया?

*क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हुआ है?

इन सवालों के जवाब अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया में सामने आने की उम्मीद है।

इनऑर्बिट मॉल का भविष्य दांव पर

इस पूरे मामले का सीधा असर मे. के. रहेजा कॉर्प के इनऑर्बिट मॉल पर पड़ सकता है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस निर्णय पर क्या रुख अपनाता है।



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