नवी मुंबई: नवी मुंबई महानगरपालिका की सीबीएसई स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर स्थायी समिति की बैठक में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। स्कूल क्रमांक 94, कोपरखैरणे स्थित सीबीएसई स्कूल के लिए बाहरी संस्था के माध्यम से शिक्षक उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर शिवसेना की वरिष्ठ नगरसेविका सरोज पाटील ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। उन्होंने प्रस्ताव को आर्थिक, प्रशासनिक और शैक्षणिक दृष्टि से गंभीर बताते हुए अंतिम मंजूरी से पहले संपूर्ण पुनर्विचार की मांग की।
बैठक में बोलते हुए सरोज पाटील ने कहा कि यह मामला केवल खर्च मंजूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि महानगरपालिका की शिक्षा नीति, विद्यार्थियों के भविष्य, शिक्षक प्रबंधन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। ऐसे संवेदनशील विषय को केवल ठेका प्रक्रिया की तरह देखना शिक्षा व्यवस्था का अवमूल्यन है।
उन्होंने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए बताया कि प्रारंभ में इस योजना के लिए 10 वर्षों हेतु ₹33.68 करोड़ की मंजूरी दी गई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹34.98 करोड़ कर दिया गया। उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी लागत वृद्धि किस आधार पर की गई और प्रारंभिक अनुमान में भविष्य निर्वाह निधि (PF) जैसी अनिवार्य राशि क्यों शामिल नहीं की गई।
सरोज पाटील ने 10 वर्ष के लंबे करार पर भी कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां बिना परीक्षण सीधे लंबा करार किया जाए। पहले 2 से 3 वर्षों की प्रायोगिक अवधि रखकर संस्था की गुणवत्ता, कार्यक्षमता और जवाबदेही जांची जानी चाहिए थी। सीधे 10 वर्ष का करार भविष्य में नियंत्रण, गुणवत्ता और आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि महानगरपालिका की अपनी स्कूलों के लिए शिक्षक उपलब्ध कराना प्रशासन की मूल जिम्मेदारी है, फिर यह काम बाहरी संस्था को क्यों सौंपा जा रहा है? क्या मनपा शिक्षा का अप्रत्यक्ष निजीकरण या ठेकाकरण कर रही है?
निविदा प्रक्रिया को लेकर भी उन्होंने गंभीर आपत्ति जताई। इतने बड़े और दीर्घकालीन करार के लिए केवल तीन निविदाकारों की भागीदारी पर उन्होंने संदेह व्यक्त किया। उनका कहना था कि सीमित भागीदारी में वास्तविक प्रतिस्पर्धा कैसे सुनिश्चित हुई, यह स्पष्ट नहीं है। QCBS पद्धति से प्रक्रिया होने के बावजूद तकनीकी और वित्तीय गुणांकन का पूरा ब्यौरा समिति के सामने नहीं रखा गया।
चयनित संस्था नवी मुंबई महिला उत्कर्ष मंडल की पात्रता पर भी सवाल उठे। सरोज पाटील ने पूछा कि क्या संस्था को सीबीएसई स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध कराने का अनुभव है? क्या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने वाले प्रशिक्षित और विषय विशेषज्ञ शिक्षक उपलब्ध हैं? संस्था की गुणवत्ता और प्रशिक्षण व्यवस्था क्या है?
करार की शर्तों को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई। यदि संस्था समय पर शिक्षक उपलब्ध नहीं कराती, अपात्र शिक्षक नियुक्त करती है या विद्यार्थियों के शैक्षणिक परिणाम प्रभावित होते हैं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? प्रस्ताव में दंडात्मक प्रावधान और जवाबदेही स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने मांग की कि अंतिम मंजूरी से पहले विस्तृत अनुमानपत्र, खर्च वृद्धि का कारणपत्र, निविदाकारों का गुणांकन, चयनित संस्था का अनुभव, मसौदा करारनामा, दंडात्मक शर्तें, शिक्षकों की योग्यता और मानधन संरचना जैसे सभी दस्तावेज स्थायी समिति के सामने रखे जाएं।
अंत में सरोज पाटील ने कहा कि अपूर्ण अनुमान, बढ़ा हुआ खर्च, सीमित प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता की कमी के आधार पर शिक्षा जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी 10 वर्षों के लिए बाहरी संस्था को सौंपना उचित नहीं है। इसलिए इस प्रस्ताव को तत्काल मंजूरी न देकर पुनर्विचार के लिए रोका जाना चाहिए।
