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मौत के बाद भी नहीं थमी ‘वसूली’? पनवेल सरकारी अस्पताल पर गंभीर आरोप, कफ़न के लिए पैसे मांगने का दावा, शोक में डूबे परिवार ने उठाए अस्पताल व्यवस्था पर सवाल

मौत के बाद भी नहीं थमी ‘वसूली’? पनवेल सरकारी अस्पताल पर गंभीर आरोप, कफ़न के लिए पैसे मांगने का दावा, शोक में डूबे परिवार ने उठाए अस्पताल व्यवस्था पर सवाल

नवी मुंबई।

नवी मुंबई के पनवेल स्थित राज्य सरकार के उप जिला अस्पताल से एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक मामला सामने आया है। इलाज के दौरान एक महिला की मौत के बाद पोस्टमार्टम हाउस में शव को कफ़न में लपेटने के नाम पर पैसे मांगने का आरोप लगा है। इस घटना ने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था, संवेदनशीलता और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मृतका के पति किरण बोराडे, जो तुर्भे क्षेत्र के निवासी हैं, ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी का मंगलवार को उपचार के दौरान निधन हो गया था। मौत के बाद नियमानुसार शव को पोस्टमार्टम के लिए पनवेल के उप जिला अस्पताल भेजा गया। परिवार पहले से ही गहरे सदमे और आर्थिक तंगी से गुजर रहा था, लेकिन आरोप है कि पोस्टमार्टम हाउस में मौजूद कर्मचारियों ने शव को कफ़न में लपेटने के लिए ₹600 की मांग की।

परिजनों के मुताबिक, जब उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला दिया तो रकम कम करने की बात हुई। अंततः साथ आए परिचितों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाकर करीब ₹500 देने के बाद ही शव परिजनों को सौंपा गया। परिवार का कहना है कि जिस समय उन्हें मानसिक सहारे और संवेदनशील व्यवहार की आवश्यकता थी, उस समय उनसे पैसे मांगना बेहद अमानवीय और पीड़ादायक अनुभव था।

इस घटना के बाद मृतका के परिजनों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि गरीब और जरूरतमंद लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। परिवार ने प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम अंतिम संस्कार से जुड़ी बुनियादी सुविधाएं जैसे कफ़न, शव वाहन और अन्य आवश्यक सेवाएं गरीब परिवारों को मुफ्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

घटना की जानकारी सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों में भी आक्रोश देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों ने इसे मानवता को शर्मसार करने वाली घटना बताया है।

हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन की चुप्पी ने लोगों के बीच संदेह और नाराजगी को और बढ़ा दिया है।

यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सरकारी अस्पतालों में गरीबों को सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार मिल पा रहा है या नहीं। स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता को यह मामला फिर उजागर करता है।


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